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नास्तिक की डायरी

मेरे मॊहल्ले के सभी लोग उसे नास्तिक कहते हॆ.बडा अजीब शख्स हॆ,जब भी मॊह्ल्ले में कोई धार्मिक आयोजन होता हॆ,यदि गलती से उसके पास आर्थिक-सहयोग लेने चले जाओ,तो भाषण देना शुरु कर देगा,लेकिन धर्म के नाम पर फूटी कोडी नहीं देगा.उसकी एक डायरी हमारे हाथ लगी हॆ. डायरी के कुछ पन्ने आपके सम्मुख प्रस्तुत हॆं:-

बुधवार, 2 मार्च 2011

ब्लॉगनामा

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Posted by विनोद पाराशर at 6:11 am

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विनोद पाराशर

हिंदी साहित्य से जुडा-एक सामान्य व्यक्ति.परिवार में-मां-बाप,आधा-दर्जन बहनें,एक भाई.बहन-भाईयों में सबसे बडा होने का सॊभाग्य मुझे प्राप्त हुआ हॆ.सभी-बहन-भाई अपनी-अपनी घर-गृहस्थी में व्यस्त ऒर मॆं अपनी में.मेरे साथ हे-मेरे हर सुख-दु:ख की साथी मेरी पत्नी व मेरे दो बेटे.मेंने हिन्दी भाषा में-एम.ए-किया हॆ.हिन्दी साहित्य पठन-लेखन से जुडा हूं.देश के कई प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में कवितायें, लेख इत्यादि प्रकाशित.’नया-घर’ नाम से एक कविता-संग्रह वर्ष-1991 में प्रकाशित.आज-कल समय मिलने पर नेट-पर सर्फिंग कर लेता हूं.ब्लाग लेखन भी कर रहा हूं.

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